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अंखियाँ श्याम प्रेम रस माती – कृष्ण भजन

अंखियाँ श्याम प्रेम रस माती – कृष्ण भजन

shyam prem ras mati akhiya by jagat guru shri kripaalu ji maharaj

 

श्याम प्रेम रस माती, अंखियाँ।

जब ते लखी नंदनंदन छवि,
मंद मंद मुस्काती।

तब ते इक पल कहँ नहिं कल सखि,
तलफति हों दिनराती।

ये निगुरी समुझति नहिं यद्यपि,
समुझावति बहु भाँती।

करि करि सूरति सावारिहीं सूरति,
भरी अँसुवन झरी लाती।

खारी लग बैकुण्ठ विभुतिहूँ,
मुक्तिहू नहिं सुहाती।

हों ʻकृपालुʼ अब हारि गयी सखि,
तू ही कछु समुझाती।

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